यह कहाँ से लिया गया है यह बताना कठिन है । आपको कहाँ से प्राप्त हुआ यह बताएँ तो इसपर और अधिक शोध हो सकेगा ।<br />
फिलहाल यदि इस की वर्तनी गलत नहीं है तो इसका अर्थ निकालने का प्रयत्न किया जा सकता है ।<br />
यहाँ इसके प्रतिपद का अर्थ निकालने का प्रयत्न कर रहा हूँ किन्तु यह प्रयत्न अनन्तिम है तथा दोष की सम्भावना से रहित नहीं है ।<br />
<br />
ब्रह्माज्ञानाज्जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः। अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते<br />
<br />
ब्रह्माज्ञानाज्जगज्जन्म <br />
ब्रह्म (ब्रह्म के) अज्ञानात् (अज्ञान से) जगत् (संसार) जन्म – ब्रह्म के अज्ञान से संसार का जन्म<br />
<br />
ब्रह्मणोऽकारणत्वतः<br />
ब्रह्मणः (ब्रह्म से/ब्रह्म का) कारण तु अतः (यहाँ से⁄इसमें) – <br />
इसमें कारण भी ब्रह्म ही है<br />
<br />
अधिष्ठानत्वमात्रेण <br />
अधिष्ठानत्व (निकटता⁄निवास) मात्रेण (केवल)<br />
केवल निवास या निकटता होने के कारण<br />
<br />
कारणं ब्रह्म गीयते<br />
इसका कारण ब्रह्म कहा जाता है ।<br />
<br />
अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं किन्तु आशय कुछ इस तरह हो सकता है – <br />
<br />
ब्रह्म के अज्ञान स्वरूप ही संसार का ज्ञान उत्पन्न होता है जिसके (जिस माया या संसार के आभास या भ्रम का) कारण भी ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही इसका अधिष्ठान अथवा निवास है अतः ब्रह्म को ही इस जगत् का भी कारण कहा जाता है ।<br />
<br />
यह इसका निर्दुष्ट आशय नहीं है । इसका अर्थ सम्भवतः कुछ ठीक हो और यह भी सम्भव है कि उक्त अर्थ इसके विपरीत ही हो । पर इसके अध्ययन से कुछ वेदांत से सम्बन्धित सिद्धान्त की प्रतीति हो रही है ।<br />
विषय और स्रोत के अज्ञान के कारण इतनी ही सहायता कर सकने में समर्थ हूँ । कृपया क्षमा कीजियेगा ।<br />
<br />
टिप्पणियाँ
फिलहाल यदि इस की वर्तनी गलत नहीं है तो इसका अर्थ निकालने का प्रयत्न किया जा सकता है ।<br />
यहाँ इसके प्रतिपद का अर्थ निकालने का प्रयत्न कर रहा हूँ किन्तु यह प्रयत्न अनन्तिम है तथा दोष की सम्भावना से रहित नहीं है ।<br />
<br />
ब्रह्माज्ञानाज्जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः। अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते<br />
<br />
ब्रह्माज्ञानाज्जगज्जन्म <br />
ब्रह्म (ब्रह्म के) अज्ञानात् (अज्ञान से) जगत् (संसार) जन्म – ब्रह्म के अज्ञान से संसार का जन्म<br />
<br />
ब्रह्मणोऽकारणत्वतः<br />
ब्रह्मणः (ब्रह्म से/ब्रह्म का) कारण तु अतः (यहाँ से⁄इसमें) – <br />
इसमें कारण भी ब्रह्म ही है<br />
<br />
अधिष्ठानत्वमात्रेण <br />
अधिष्ठानत्व (निकटता⁄निवास) मात्रेण (केवल)<br />
केवल निवास या निकटता होने के कारण<br />
<br />
कारणं ब्रह्म गीयते<br />
इसका कारण ब्रह्म कहा जाता है ।<br />
<br />
अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं किन्तु आशय कुछ इस तरह हो सकता है – <br />
<br />
ब्रह्म के अज्ञान स्वरूप ही संसार का ज्ञान उत्पन्न होता है जिसके (जिस माया या संसार के आभास या भ्रम का) कारण भी ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही इसका अधिष्ठान अथवा निवास है अतः ब्रह्म को ही इस जगत् का भी कारण कहा जाता है ।<br />
<br />
यह इसका निर्दुष्ट आशय नहीं है । इसका अर्थ सम्भवतः कुछ ठीक हो और यह भी सम्भव है कि उक्त अर्थ इसके विपरीत ही हो । पर इसके अध्ययन से कुछ वेदांत से सम्बन्धित सिद्धान्त की प्रतीति हो रही है ।<br />
विषय और स्रोत के अज्ञान के कारण इतनी ही सहायता कर सकने में समर्थ हूँ । कृपया क्षमा कीजियेगा ।<br />
<br />